भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की है.
दोनों नेताओं के बीच यह बैठक चीन के तियानजिन में हुई, जहां शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (एससीओ) समिट हो रहा है.
पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से वार्ता के दौरान कहा, "पिछले वर्ष कज़ान में हमारी बहुत ही सार्थक चर्चा हुई थी. हमारे संबंधों को एक सकारात्मक दिशा मिली है. सीमा पर डिसइंगेजमेंट के बाद शांति और स्थिरता का माहौल बना हुआ है. हमारे स्पेशल रिप्रेंजेटेटिव के बीच बॉर्डर मैनेजमेंट को लेकर सहमति बनी है."
वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, "दुनिया बदलाव की ओर बढ़ रही है. चीन और भारत दुनिया की दो सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं. हम दोनों दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देश हैं और ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं. दोस्त बने रहना, अच्छे पड़ोसी होना, ड्रैगन और हाथी का साथ आना बहुत ज़रूरी है."
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मोदी का यह दौरा तब हुआ है, जब पूर्वी लद्दाख में सीमा पर अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति बहाल नहीं हो पाई है.
चीन ने 2020 के बाद कई बार अरुणाचल प्रदेश के कई इलाक़ों का मंदारिन में नामकरण किया है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहता है.
ये अलग बात है कि भारत वन चाइना पॉलिसी को मानता है, जिसमें तिब्बत और ताइवान दोनों चीन के हिस्सा हैं.
पीएम मोदी के एससीओ समिट में शामिल होने के लिए चीन जाने के फ़ैसले को बहुत प्रत्याशित नहीं माना जा रहा था. 2023 में एससीओ की अध्यक्षता भारत के पास थी और भारत ने इस समिट को वर्चुअल आयोजित किया था.
समिट को वर्चुअल आयोजित करने के फ़ैसले का मायने यह निकाला गया कि भारत चीन के दबदबे वाले गुटों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है.
वहीं 2022 में भारत में जी-20 समिट हुआ था और इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे. ऐसे में मोदी के चीन दौरे को अमेरिका के साथ भारत के ख़राब हो रहे संबंधों से जोड़ा जा रहा है.
इससे पहले मोदी और शी जिनपिंग पिछले साल अक्तूबर में रूस के क़ज़ान में मिले थे.
कज़ान में ब्रिक्स समिट के दौरान शी जिनपिंग और पीएम मोदी मिले थे. ब्रिक्स और एससीओ दोनों को अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ गुट के रूप में देखा जाता है.
कज़ान में जब मोदी-शी मिले थे तब दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कम करने की चुनौती थी.
तियानजिन में जब मोदी शी से मिले तब भारत-चीन के संबंधों में मज़बूती लाने के अलावा अमेरिकी टैरिफ़ से निपटना भी एक बड़ी चुनौती है.
एससीओ समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सामना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से भी होगा. पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बार ऐसा पहली बार होगा.
मीटिंग में क्या बोले पीएम मोदीप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ मीटिंग में पिछले साल कज़ान में हुई मुलाक़ात के साथ हाल ही में दोनों देशों के बीच हुए कई समझौतों की चर्चा की.
पीएम मोदी ने हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच हुई प्रगति का हवाला देते हुए कहा, "कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई है. दोनों देशों के बीच डायरेक्ट फ़्लाइट भी फिर से शुरू की जा रही है. हमारे सहयोग से दोनों देशों के 2.8 अरब लोगों के हित जुड़े हुए हैं.''
''इससे पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा. परस्पर विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर हम अपने संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबंध हैं. एससीओ की अध्यक्षता के लिए मैं आपको बहुत-बहुत बधाई देता हूं."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल बाद चीन की यात्रा पर गए हैं. यह दौरा काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय से तनाव रहा है.
2018 के बाद यह पहला मौक़ा है, जब दोनों नेता चीन में आमने-सामने मिले. विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत चीन के साथ रिश्ते सुधारकर अमेरिकी दबाव के ख़िलाफ़ संतुलन बनाने की कोशिश कर सकता है.
चीन पहले से ही भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन संतुलन चीन के पक्ष में ज्यादा है.
ओबामा प्रशासन के दौरान रूस में अमेरिकी राजदूत रहे माइकल मैकफ़ॉल ने एक्स पर लिखा, "आख़िर ट्रंप ने मोदी को इतना अलग-थलग कैसे कर दिया कि अब वो तानाशाह शी जिनपिंग और पुतिन के साथ शिखर सम्मेलन में भाग ले रहे हैं? अभी पिछले साल ही तो चीन और भारत एक-दूसरे से युद्ध की स्थिति में थे! ट्रंप और उनकी टीम कूटनीति में बिल्कुल ही नाकाम हैं."
चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. पिछले साल चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार क़रीब 127.7 अरब डॉलर था.
इसके अलावा भारतीय इंडस्ट्री की निर्भरता चीन पर बढ़ रही है. भारत ने साल 2024 में चीन से 48 अरब डॉलर की क़ीमत के इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल उपकरण आयात किए थे.
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह का कहना है कि मोदी की मुलाक़ात शी जिनपिंग से ऐसे समय पर हो रही है, जब वह बहुत कमज़ोर स्थिति में हैं.
सुशांत सिंह ने एक्स पर लिखा, "मोदी बहुत कमज़ोर स्थिति में चीन जा रहे हैं, क्योंकि ट्रंप ने उन्हें निशाना बनाया है और उनके पास कोई दबाव बनाने की ताक़त नहीं है. चीन भारत से दोस्ताना रिश्ते चाहता है लेकिन पूरी तरह अपने हिसाब से. चीन ने भारत को एलएसी, व्यापार, तिब्बत, रेयर अर्थ पर कोई रियायत नहीं दी है."
"पाकिस्तान को लेकर चीन कोई वादा करने को तैयार नहीं है, चाहे वह सैन्य सहयोग हो या कोई और क्षेत्र. आख़िर में, चीन अमेरिका का विकल्प नहीं हो सकता है और यह तीनों पक्ष जानते हैं."
थिंक टैंक ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान मानती हैं कि अमेरिका से इतर रूस और चीन की दोस्ती भी भारत के लिए बड़ी चुनौती है.
तन्वी मदान लिखती हैं, "भारत के लिए चुनौती ये है कि आज रूस और चीन के आपस में रिश्ते भारत से ज़्यादा बेहतर हैं. इनमें से एक भारत का प्रतिद्वंद्वी (चीन) है और दूसरा (रूस) उस प्रतिद्वंद्वी (चीन) पर ज़्यादा निर्भर है और सोच भी उससे मिलती है. लोग ये भूल जाते हैं कि भारत और रूस के पुराने क़रीबी रिश्तों की बड़ी वजह उनका चीन से टकराव था."

सामरिक मामलों के जाने-माने विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि पिछले अनुभवों के आधार पर चीन भारत की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर सकता है.
ब्रह्मा चेलानी लिखते हैं, "पिछले अनुभव बताते हैं कि चीन भारतीय कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने की ज़्यादा कोशिश करेगा, बजाय इसके कि वह भरोसेमंद साथी बने. जब मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने थे तो उनका शुरुआती भरोसा था कि रिश्ते सुधारे जा सकते हैं. यह भरोसा ग़लत नहीं था लेकिन चीन ने लगातार उनकी दोस्ताना नीति का इस्तेमाल कर ज़मीन पर चुपचाप बढ़त बनाई और उन्होंने (मोदी) रास्ता नहीं बदला, यह ग़लती थी."
"चीन ने भारत को यह मानने का कोई कारण नहीं दिया कि इस बार हालात अलग होंगे. उल्टा, जब भारत ने मई में पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों पर हमले किए तो चीन ने पाकिस्तान को मदद दी, जिसमें रियल-टाइम रडार और सैटेलाइट डेटा भी शामिल था. इसके अलावा, चीन ने हाल ही में दुनिया का सबसे बड़ा बांध भारत की सीमा के पास बनाने की योजना की पुष्टि की- जो भारत के लिए गंभीर पर्यावरणीय और राष्ट्रीय सुरक्षा के असर लाएगा."
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिन्दू' के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी का कहना है कि ट्रंप के दबाव के सामने मोदी नहीं झुकेंगे.
स्टैनली जॉनी ने लिखा, " मोदी ट्रंप के दबाव वाले तरीक़ों के आगे झुकने वाले नहीं हैं. साथ ही, भारत तेल कहां से ख़रीदेगा इसका फ़ैसला भारत में होगा, न कि अमेरिका में. इसका मतलब यह नहीं कि भारत-अमेरिका रिश्ते टूट रहे हैं.''
''रिश्तों को दोबारा मज़बूत करने की संभावना है लेकिन यह सिर्फ़ ट्रंप की शर्तों पर नहीं होगा. भारत अच्छी तरह जानता है कि चीन के साथ शक्ति का संतुलन नहीं है और हां, भारत को अपनी रणनीतिक कमियों को भरने के लिए अमेरिका की ज़रूरत है. लेकिन अगर अमेरिका दुश्मन जैसा व्यवहार करता रहा तो भारत के पास और विकल्प भी हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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