नई दिल्ली: दिल्ली में अब सांस लेना भी खतरा बनता जा रहा है। एक नई स्टडी में पता चला है कि राजधानी की हवा में छोटे प्लास्टिक के कण मौजूद हैं। यह स्टडी बताती है कि हवा में PM10, PM2.5 और PM1 जैसे कणों में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हैं। वहीं वैज्ञानिकों का कहना है कि माइक्रोप्लास्टिक को सांस के जरिए लेने के खतरे के बारे में अभी ठीक से पता नहीं है। लेकिन, लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहने से सांस की बीमारियां, फेफड़ों में सूजन और कैंसर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
'दिल्ली-एनसीआर में हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक' नाम की यह स्टडी पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेओरोलॉजी और सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने की है।
हवा में मिले माइक्रोप्लास्टिक के कण
इस स्टडी के लिए दिल्ली के लोधी रोड इलाके में सर्दियों (जनवरी-मार्च) और गर्मियों (अप्रैल-जून) 2024 में हवा के सैंपल लिए गए। रिसर्च करने पर पता चला कि इन सैंपल में 2,087 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले। PM10 में 1.87 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर, PM2.5 में 0.51 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर और PM1 में 0.49 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर की मात्रा पाई गई।
स्टडी के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक आसपास के खुले इलाकों में फेंके गए प्लास्टिक कचरे से आ सकते हैं। मौसम की स्थिति से भी माइक्रोप्लास्टिक के फैलाव पर असर पड़ता है। हवा के कारण ये कण शहर के आसपास के इलाकों से भी आ सकते हैं। स्टडी में यह भी कहा गया है कि माइक्रोप्लास्टिक खाने में मिल सकते हैं या प्रदूषित वातावरण में रहने के दौरान शरीर में जा सकते हैं।
हवा में सफेद और नीले रंग के कण
जांच में पता चला कि माइक्रोप्लास्टिक के कण ज्यादातर पॉलीइथिलीन और पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट से बने थे। ये कण छोटे टुकड़े (66%) और रेशे (32%) के रूप में थे। ज्यादातर कण सफेद या नीले रंग के थे और इनका आकार 1-1000 माइक्रोमीटर के बीच था।
रिसर्च में कहा गया है, गर्मी के मौसम में माइक्रोप्लास्टिक की ज्यादा मात्रा और हवा के जरिए इनके दूर तक फैलने से पता चलता है कि स्थानीय उत्सर्जन, वायुमंडलीय बदलाव और शहरी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के बीच गहरा संबंध है।
बच्चों और बुजुर्गों के लिए चिंता
वहीं बच्चों और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील लोगों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक के खतरे के बारे में अभी पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है, लेकिन ये कण हानिकारक पदार्थों को सोख सकते हैं और सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
स्टडी में यह भी कहा गया है कि माइक्रोप्लास्टिक को हवा की गुणवत्ता की जांच में शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही, लोगों के स्वास्थ्य पर इसके असर को समझने के लिए लंबे समय तक अलग-अलग जगहों पर निगरानी रखनी चाहिए।
'दिल्ली-एनसीआर में हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक' नाम की यह स्टडी पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेओरोलॉजी और सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने की है।
हवा में मिले माइक्रोप्लास्टिक के कण
इस स्टडी के लिए दिल्ली के लोधी रोड इलाके में सर्दियों (जनवरी-मार्च) और गर्मियों (अप्रैल-जून) 2024 में हवा के सैंपल लिए गए। रिसर्च करने पर पता चला कि इन सैंपल में 2,087 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले। PM10 में 1.87 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर, PM2.5 में 0.51 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर और PM1 में 0.49 माइक्रोप्लास्टिक प्रति क्यूबिक मीटर की मात्रा पाई गई।
स्टडी के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक आसपास के खुले इलाकों में फेंके गए प्लास्टिक कचरे से आ सकते हैं। मौसम की स्थिति से भी माइक्रोप्लास्टिक के फैलाव पर असर पड़ता है। हवा के कारण ये कण शहर के आसपास के इलाकों से भी आ सकते हैं। स्टडी में यह भी कहा गया है कि माइक्रोप्लास्टिक खाने में मिल सकते हैं या प्रदूषित वातावरण में रहने के दौरान शरीर में जा सकते हैं।
हवा में सफेद और नीले रंग के कण
जांच में पता चला कि माइक्रोप्लास्टिक के कण ज्यादातर पॉलीइथिलीन और पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट से बने थे। ये कण छोटे टुकड़े (66%) और रेशे (32%) के रूप में थे। ज्यादातर कण सफेद या नीले रंग के थे और इनका आकार 1-1000 माइक्रोमीटर के बीच था।
रिसर्च में कहा गया है, गर्मी के मौसम में माइक्रोप्लास्टिक की ज्यादा मात्रा और हवा के जरिए इनके दूर तक फैलने से पता चलता है कि स्थानीय उत्सर्जन, वायुमंडलीय बदलाव और शहरी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के बीच गहरा संबंध है।
बच्चों और बुजुर्गों के लिए चिंता
वहीं बच्चों और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील लोगों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक के खतरे के बारे में अभी पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है, लेकिन ये कण हानिकारक पदार्थों को सोख सकते हैं और सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
स्टडी में यह भी कहा गया है कि माइक्रोप्लास्टिक को हवा की गुणवत्ता की जांच में शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही, लोगों के स्वास्थ्य पर इसके असर को समझने के लिए लंबे समय तक अलग-अलग जगहों पर निगरानी रखनी चाहिए।
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